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28 May 2020, 06:15 PM

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समझौता

समझौता

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धीरे-धीरे हम ज़िंदगी के साथ
समझौता करके जीना सीख जाते है।
आजादी सबको प्यारी हैं,
बंधन कोई नहीं चाहता हैं।

पर जब बात जीवन पर आयी,
सबको ये बंधन प्यारा लगने लगा।
ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच ये है, 
की सब जीना चाहते हैं।

सब अपनों के साथ खुश रहना चाहते हैं,
और दूर है आज अपनों से।
पर इन दूरियों में कहीं अपनों के लिए परवाह है,
अपनों के कष्ट का कारण ना बने।

आगे आने  वाले कई वर्षों के लिए,
इस एक वर्ष का बलिदान करने लगे।
जो रोजी-रोटी के लिए निकले थे घरों से,
आज रोटी और एक छत के लिए वापस चल पड़े।

पैसा सब कुछ नहीं हैं,
पर संकट ने बताया के कुछ तो हैं।
रोटी की असल कीमत देने के लिए,
कुछ तो होना जरूरी हैं।

समय कभी बता के नही आता,
बुरे वक़्त में मजबूर ना हो इतना तो हो खुद के पास।
हां बंधन कोई नहीं चाहता है,
पर जीवन का बंधन सबसे प्यारा है।

अपनों का मोह है, 
जो सबको घरों में बांध के रख रहा है।
कल जब ये संकट टल जाएगा,
तब शायद बहुत कुछ हैं जो बदल जाएगा।

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Written by: Nidhi Kala. A Lecturer in college, Nidhi is a sensitive-to-nature-and-people kind of a person and in-closet poet.

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