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रिश्ते भी एक पहेली हैं

रिश्ते भी एक पहेली हैं

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रिश्ते भी एक पहेली हैं
कितनी ही कोशिश कर लो
समझने की 
समझ आते ही नहीं।
कहीं हम चाहते हैं कि
वो हमें समझे
तो वो चाहते हैं
हम उन्हें।
बस इन्हीं सबके 
ताने-बाने में
उलझ जाते हैं
धागे ये।
बाज दफा सुलझाती हूं
पर कोशिशें नाकाम
होती देख और 
उलझ जाती हूं।
एक अजीब सी 
बेचैनी दिल में रहती हैं
जब ये पहेली 
उलझी होती हैं।
और बच्चों सी 
चहक जाती हूं
जब कोई गिरह 
सुलझी हुई नजर आती हैं।
कभी वीणा के तारों से
कि खींच दिए तो टूट गए,
सही करने की कोशिश नाकाम हुई 
तो उंगलियों को घाव दिए।
जो तन को लगे घाव
 भर भी गए कभी,
और जो मन को लगे
वो कभी भरे ही नहीं।
कुछ उलझे 
पर सुलझ गए,
और कुछ ऐसे कि
सुलझे ही नहीं।
ये धागे ही ऐसे हैं
जो कच्चे थे टूट गए,
रेशम के रहे होंगे
इतने नाजुक कि टूट गए।
मोती की टूटी माला से
बिखर गए, 
संभाले मोती पिरोने को
कुछ धरती पर
गिर कर टूट गए।
कांच के रहे होंगे 
जो टूट गए।
बाकी जो बचे मोती
उन्हें नए धागों से पिरो दिया।
ये रिश्ते भी एक पहेली हैं।

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Written by: Nidhi Kala. A Lecturer in college, Nidhi is a sensitive-to-nature-and-people kind of a person and in-closet poet.

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