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बंद खिड़कियों को खोल के

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6 August 2020, 12:34 AM

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बंद खिड़कियों को खोल के

बंद खिड़कियों को खोल के

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बंद खिड़कियों को खोल के,
खुली हवा को आने दो।
सुबह की किरणें झांक सके,
पर्दे किनारे करने दो।
मेरे आंगन में लगे आम से,
बच्चों को आंबिया तोड़ने दो।
क्यारी में लगे गुलाबों पर,
भंवरों को मंडराने दो।
वक़्त ही कुछ ऐसे है,
कि बंद है दरवाजे।
तुम जो चाहो क़िस्मत के,
दरवाज़े खोलने दो।

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Written by: Nidhi Kala. A Lecturer in college, Nidhi is a sensitive-to-nature-and-people kind of a person and in-closet poet.

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